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वसुंधरा

किताबों की दुनिया

AGAN JAL

150.00

विनोद पदरज से मिलना ‘कविता और प्रेम’ से मिलना है, उन्हें पढऩा एक कुशल संवेदनशील आत्मीय कवि को पढऩा है। लोक संस्कृति, लोक स्मृति, लोक बोली, जन जीवन के अंतर की हिलोरों, आवेगों, उद्वेगों की गहरी समझ, यथार्थ से गहरी वाबस्तगी। विनोद जी की निजी प्रतिभा है, इसे बिना कविता पढ़े नहीं जाना जा सकता। कविता का लगाव ग्रामीण परिवेश में थपेड़ों से जूझती उन जीवित छवियों से है, जिनसे जि़ंदगी का फलसफा मूर्त होता है। विनोद जी की कविताएँ लोक चित्त संवादी कविताएँ हैं। कोमल रंगों के सहारे स्वप्न और यथार्थ का मिला जुला आभास। सीताकांत महापात्र कहते हैं, ‘हमारे समय को चित्रित करने वाले भय से बढ़ कर दूसरी कोई वस्तु नहीं।’ यही भय किसानों, मजदूरों, दलित स्त्रियों के चेहरों पर लिखा है, इन्हीं बेबस चेहरों को विनोद जी की कविताओं में देखा जा सकता है। देखने की क्रिया का बोध केवल क्षणिक और चाक्षुष नहीं, बल्कि मस्तिष्क के भीतर है, उसका प्रतिबिंब दीर्घकाल तक मानस पटल पर मौजूद रहता है। विनोद जी के पास यथार्थ को आत्मीय बनाने का विलक्षण ढंग है। विनोद पदरज को पढ़ते हुए भाषा विज्ञानी प्रो. दिलीप सिंह की इस बात से सहमत हुआ जा सकता है, ‘कविता भाषा की एक विधा है।’ लोकतत्व व लोकरंग से लबरेज हिंदी का एक ज़रूरी कवि जिसे बार-बार पढऩे पर भी ताज़गी बनी रहती है। जिसकी कविताओं में आयतन और भार की अपेक्षा घनत्व को अधिक महसूस किया जा सकता है। – शशिकला राय

Jan Vasundhara Sahitya Foundation

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